रिवार के लोग बताते हैं कि माधुरी और स्वाति में बहुत प्यार था. बड़ी बहन के जाने के बाद स्वाति सदमे में रहने लगी.
“स्वाति स्कूल ख़त्म कर आगे डिप्लोमा की पढ़ाई करने वाली थी. फ़िलहाल घर में सबसे पढ़ी लिखी वही थी. इसलिए सारा व्यवहार वही रखती. किसका कितना कर्ज़ा है, किसको कितना उधार चुकाना है – सब उसे मालूम था. मैं जो भी कमाता, सारे पैसे उसी के हाथ में देता. उसकी भी शादी की बात चल रही थी लेकिन पैसों की वजह से शादी तय नहीं हो पा रही थी. sex
माधुरी के बाद उसपर काम का बोझ भी बढ़ गया. खेतों में काम भी करती, घर का काम भी और हिसाब किताब भी. वो परेशान तो थी पर इतना टूट जाएगी की ख़ुद अपनी जान ले लेगी, ऐसा हमने सपने में भी नहीं सोचा था.”
माधुरी और स्वाति की मौत के बाद तिवसा के तहसीलदार भास्कर के घर आए थे. वह मौत की तारीखें और दूसरी ज़रूरी जानकारियां भी नोट करके ले गए लेकिन उन्हें अब तक कोई मुआवज़ा नहीं मिला है.
“स्वाति स्कूल ख़त्म कर आगे डिप्लोमा की पढ़ाई करने वाली थी. फ़िलहाल घर में सबसे पढ़ी लिखी वही थी. इसलिए सारा व्यवहार वही रखती. किसका कितना कर्ज़ा है, किसको कितना उधार चुकाना है – सब उसे मालूम था. मैं जो भी कमाता, सारे पैसे उसी के हाथ में देता. उसकी भी शादी की बात चल रही थी लेकिन पैसों की वजह से शादी तय नहीं हो पा रही थी. sex
माधुरी के बाद उसपर काम का बोझ भी बढ़ गया. खेतों में काम भी करती, घर का काम भी और हिसाब किताब भी. वो परेशान तो थी पर इतना टूट जाएगी की ख़ुद अपनी जान ले लेगी, ऐसा हमने सपने में भी नहीं सोचा था.”
माधुरी और स्वाति की मौत के बाद तिवसा के तहसीलदार भास्कर के घर आए थे. वह मौत की तारीखें और दूसरी ज़रूरी जानकारियां भी नोट करके ले गए लेकिन उन्हें अब तक कोई मुआवज़ा नहीं मिला है.
भास्कर के बेटे सागर का मानना है
कि भारत के किसानों को अब खेती छोड़ देनी चाहिए. चेहरे पर किसी उजड़े शहर
जैसे उदासी लिए वह कहते हैं, “हमारी बहनें हमें माँ से भी ज़्यादा प्यार
करती थीं.
लेकिन खेती में हुए नुक़सान और कर्ज़ की वजह से उन्होंने सुसाइड कर लिया. इस देश में किसानों की कोई इज़्ज़त ही नहीं है. 70 हज़ार ज़मीन में डालो तब 45 हज़ार वापस मिलता है. हर फ़सल पर इतना नुकसान किसान कैसे सहेगा? ऐसे आत्महत्या करके मरने से तो अच्छा है कि किसान खेती करना ही छोड़ दें.”
लेकिन खेती में हुए नुक़सान और कर्ज़ की वजह से उन्होंने सुसाइड कर लिया. इस देश में किसानों की कोई इज़्ज़त ही नहीं है. 70 हज़ार ज़मीन में डालो तब 45 हज़ार वापस मिलता है. हर फ़सल पर इतना नुकसान किसान कैसे सहेगा? ऐसे आत्महत्या करके मरने से तो अच्छा है कि किसान खेती करना ही छोड़ दें.”
आंकड़े बताते हैं कि महाराष्ट्र में
वक़्त के साथ किसानों के हालात बद से बदतर ही हुए हैं. सरकारी आँकड़ों के
अनुसार, बीते दो दशकों में इस राज्य के 60 हज़ार से ज़्यादा किसान
आत्महत्या कर चुके हैं. इस साल के शुरुआती 3 महीनों में ही महाराष्ट्र में
तक़रीबन 700 किसान बढ़ते क़र्ज़ और खेती में नुकसान के चलते अपनी जान दे
चुके हैं.
राज्य के विदर्भ और मराठवाड़ा इलाके 1995 से ही किसानों की आत्महत्या का भौगोलिक केंद्र रहे हैं.
राज्य के विदर्भ और मराठवाड़ा इलाके 1995 से ही किसानों की आत्महत्या का भौगोलिक केंद्र रहे हैं.
शेंदुरजना गांव से 10 किलोमीटर दूर स्थित
तहसीलदार के दफ़्तर में मुख्य अधिकारी राम. ए. लंके स्वाति और माधुरी के
बारे में पूछे जाने पर व्यंग्य भरे लहजे में मुस्कुराते हुए कहते हैं,
“यहां लोग अपने निजी या पारिवारिक कारणों से आत्महत्या करते हैं. यह सब
मीडिया की फैलाई हुई बातें हैं. वरना असल में कर्ज़ और किसानों की
आत्महत्या में कोई संबंध नहीं.”
दोबारा कुरेद कर शेंदुरजना की दो बहनों के बारे में पूछने पर वह फ़ाइलें मंगवाकर देखते हैं. वो कहते हैं, “माधुरी को किसान साबित करने के लिए ज़रूरी साक्ष्य मौजूद नहीं थे इसलिए उसके मामले में हम कोई मुआवज़ा नहीं दे सके. लेकिन स्वाति को किसान माना गया है. उनके परिवार को जल्दी ही स्वाति के नाम पर जारी 1 लाख का सरकारी मुआवज़ा दिया जाएगा.”
स्थानीय पत्रकारों से बात करने पर यह भी मालूम चला कि माधुरी की आत्महत्या को एक काल्पनिक प्रेम प्रसंग से जोड़ कर गांव में उड़ाई गई झूठी बेबुनियाद अफ़वाहों ने भी ‘माधुरी को किसान न मानने’ के सरकारी महकमे के निर्णय को प्रभावित करने में अपनी भूमिका निभाई.
तहसीलदार के दफ़्तर से निकलते हुए मुझे अचानक भास्कर की बिलखती ज़बान से पूछा गया वह सवाल याद आ गया जिसने मुझे भी भीतर तक झकझोर दिया था.
“जब मेरी बड़ी बेटी सारी ज़िंदगी दिन-रात मेरे साथ खेतों में काम करती रही, तब भी सरकार ने उसकी आत्महत्या को किसान की आत्महत्या क्यों नहीं माना? अगर उसके मरने के बाद हमें समय पर मुआवज़ा मिल गया होता तो शायद मेरी छोटी बेटी की जान बच सकती थी.”
दोबारा कुरेद कर शेंदुरजना की दो बहनों के बारे में पूछने पर वह फ़ाइलें मंगवाकर देखते हैं. वो कहते हैं, “माधुरी को किसान साबित करने के लिए ज़रूरी साक्ष्य मौजूद नहीं थे इसलिए उसके मामले में हम कोई मुआवज़ा नहीं दे सके. लेकिन स्वाति को किसान माना गया है. उनके परिवार को जल्दी ही स्वाति के नाम पर जारी 1 लाख का सरकारी मुआवज़ा दिया जाएगा.”
स्थानीय पत्रकारों से बात करने पर यह भी मालूम चला कि माधुरी की आत्महत्या को एक काल्पनिक प्रेम प्रसंग से जोड़ कर गांव में उड़ाई गई झूठी बेबुनियाद अफ़वाहों ने भी ‘माधुरी को किसान न मानने’ के सरकारी महकमे के निर्णय को प्रभावित करने में अपनी भूमिका निभाई.
तहसीलदार के दफ़्तर से निकलते हुए मुझे अचानक भास्कर की बिलखती ज़बान से पूछा गया वह सवाल याद आ गया जिसने मुझे भी भीतर तक झकझोर दिया था.
“जब मेरी बड़ी बेटी सारी ज़िंदगी दिन-रात मेरे साथ खेतों में काम करती रही, तब भी सरकार ने उसकी आत्महत्या को किसान की आत्महत्या क्यों नहीं माना? अगर उसके मरने के बाद हमें समय पर मुआवज़ा मिल गया होता तो शायद मेरी छोटी बेटी की जान बच सकती थी.”
अमरावती से आगे बढ़ते ही हम यवतमाल
पहुंचे. यह समय का व्यंग्य ही है कि महाराष्ट्र का जो यवतमाल ज़िला बीते 2
दशकों से किसान आत्महत्याओं से जूझ रहा है, उसी जिले में जन्मे वसंतराव
नाइक न सिर्फ़ 12 वर्षों तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे बल्कि देश में हरित
क्रांति के जनक के तौर पर भी पहचाने गए.
अमरावती से यवतमाल के रास्ते में मुझे अक्सर छोटे छोटे गांवों में आज भी शिवाजी के साथ टंगे वसंतराव नाइक की तस्वीरें दिखाई दे जाती. तब एक ख़याल मन में अक्सर उठता, किसने सोचा था कि यवतमाल की जिस हरी-भरी धरती को नाइक किसानों का स्वर्ग बनाना चाहते थे, वही यवतमाल एक दिन किसानों की क़ब्रगाह के नाम से पहचाना जाएगा.
यवतमाल के पिपरी बुट्टी गांव में अब तक 42 किसान कर्ज़ और खेती में हुए माली नुकसान की वजह से आत्महत्या कर चुके हैं. यहीं रहने वाले 30 वर्षीय मोहन प्रहलाद तज़ाणे का घर पहली बार में आपकी नज़र से छूट सकता है. दो बदरंग से कच्चे-पक्के मकानों के बीच मौजूद प्रह्लाद के एक कमरे के छोटे से घर की कच्ची दीवारें इतनी टूटी और जर्जर हैं कि पहली नज़र में आप उसे किसी बड़े मकान का ढह चुका हिस्सा समझ कर आगे बढ़ जाएँगे.
लेकिन घर के भीतर कदम रखते ही गोबर से रंगी गयी कमरे की कच्ची दीवारें, धूल में लिपटे चंद बर्तन और कमरे के बीच में पड़ा एक टूटा बिस्तर – यहां मरने और जीने वालों की तकलीफ़ों भरी ज़िंदगी की गवाही पेश करते हैं.
अमरावती से यवतमाल के रास्ते में मुझे अक्सर छोटे छोटे गांवों में आज भी शिवाजी के साथ टंगे वसंतराव नाइक की तस्वीरें दिखाई दे जाती. तब एक ख़याल मन में अक्सर उठता, किसने सोचा था कि यवतमाल की जिस हरी-भरी धरती को नाइक किसानों का स्वर्ग बनाना चाहते थे, वही यवतमाल एक दिन किसानों की क़ब्रगाह के नाम से पहचाना जाएगा.
यवतमाल के पिपरी बुट्टी गांव में अब तक 42 किसान कर्ज़ और खेती में हुए माली नुकसान की वजह से आत्महत्या कर चुके हैं. यहीं रहने वाले 30 वर्षीय मोहन प्रहलाद तज़ाणे का घर पहली बार में आपकी नज़र से छूट सकता है. दो बदरंग से कच्चे-पक्के मकानों के बीच मौजूद प्रह्लाद के एक कमरे के छोटे से घर की कच्ची दीवारें इतनी टूटी और जर्जर हैं कि पहली नज़र में आप उसे किसी बड़े मकान का ढह चुका हिस्सा समझ कर आगे बढ़ जाएँगे.
लेकिन घर के भीतर कदम रखते ही गोबर से रंगी गयी कमरे की कच्ची दीवारें, धूल में लिपटे चंद बर्तन और कमरे के बीच में पड़ा एक टूटा बिस्तर – यहां मरने और जीने वालों की तकलीफ़ों भरी ज़िंदगी की गवाही पेश करते हैं.
मोहन की मां शांताबाई तज़ाणे किसान
थीं. सितम्बर 2015 में उन्होंने खेती के लिए लिया गया कर्ज़ा न चुका पाने
की वजह से ख़ुदकुशी कर ली. आज मोहन मज़दूरी करके अपने दो बच्चे और पत्नी का
पेट पालते हैं. उनकी पत्नी तीसरे बच्चे से गर्भवती है. लेकिन मोहन अपने
तीसरे बच्चे को किसी रिश्तेदार को गोद देने का मन बना चुके हैं. उदास आंखों
से अपने छोटे बेटे को गोद में लेते हुए वह कहते हैं कि उनके पास तीसरे
बच्चे को पालने के संसाधन नहीं हैं.
लेकिन मोहन के इस तीसरे बच्चे की क़िस्मत तो 2011 में उस वक़्त ही तय हो गयी थी, जब मोहन के किसान पिता बाबूराम प्रहलाद तज़ाणे ने बढ़ते कर्ज़ के कारण आत्महत्या की थी.
इसके बाद मोहन की माँ ने घर की बागडोर अपने हाथ में ली. वह किसान की भूमिका में आईं और अपनी पांच एकड़ ज़मीन पर खेती करने लगीं. पर फ़सल के ठीक दाम नहीं मिले और कर्ज़ ने उनका पीछा नहीं छोड़ा.
लेकिन मोहन के इस तीसरे बच्चे की क़िस्मत तो 2011 में उस वक़्त ही तय हो गयी थी, जब मोहन के किसान पिता बाबूराम प्रहलाद तज़ाणे ने बढ़ते कर्ज़ के कारण आत्महत्या की थी.
इसके बाद मोहन की माँ ने घर की बागडोर अपने हाथ में ली. वह किसान की भूमिका में आईं और अपनी पांच एकड़ ज़मीन पर खेती करने लगीं. पर फ़सल के ठीक दाम नहीं मिले और कर्ज़ ने उनका पीछा नहीं छोड़ा.
इस बीच उनके गांव में किसानों का
आत्महत्या करना जारी रहा. तभी मार्च 2015 में मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस
मोहन के गांव आए. गाड़ियों का इतना लम्बा काफ़िला मोहन को आज भी याद है.
“पूरे गांव में अफ़रा तफ़री मच गयी. बताया गया कि मुख्यमंत्री गांव का दौरा करेंगे और रात को भी यहां रुकेंगे. हमें लगा अब हमारी मुश्किलें कम हो जाएँगी. देवेंद्र फडनवीस मेरे घर भी आए थे. उन्होंने घर की हालत देखकर कहा कि ‘अरे, इसकी परिवार की हालत तो बहुत ख़राब है.’ फिर उन्होंने कहा कि वह मुझे मदद में कुंआ देंगे. मैंने कहा मुझे धड़क योजना में कुंआ दे दो. उन्होंने कहा- धड़क नहीं, रोज़गार योजना में देंगे. फिर रोज़गार योजना में मुझे कुंआ जारी हुआ. मैंने अपनी तरफ़ से भी कर्ज़ा ले लेकर पैसे लगाए लेकिन कुएँ में आज तक पानी नहीं है”.
‘धड़क योजना’ महाराष्ट्र सरकार की एक जन-कल्याण स्कीम है. इसके तहत किसानों को सरकारी ख़र्च पर कुंआ बनवाकर दिया जाता है. इस योजना के तहत गांव में कुंआ बनवाने के लिए ‘किसान आत्महत्या’ की घटनाओं वाले परिवारों को प्राथमिकता दी जाती है. मोहन के परिवार को ‘धड़क योजना’ की बजाय मनरेगा योजना के तहत कुंआ दिया गया. इसके तहत ज़मीन देने से लेकर मज़दूर जुटाने तक का सारा काम ग्राम पंचायत और क्षेत्र में मनरेगा के नोडल अधिकारी के पास आ गया. मोहन के अनुसार प्रशासनिक लचरता, कभी मज़दूरों की कमी तो कभी मशीनों की गैर-मौजूदगी की वजह से उनके कुंए का काम पूरा नहीं हो पाया. क़र्ज़ जस का तस बना रहा.
“पूरे गांव में अफ़रा तफ़री मच गयी. बताया गया कि मुख्यमंत्री गांव का दौरा करेंगे और रात को भी यहां रुकेंगे. हमें लगा अब हमारी मुश्किलें कम हो जाएँगी. देवेंद्र फडनवीस मेरे घर भी आए थे. उन्होंने घर की हालत देखकर कहा कि ‘अरे, इसकी परिवार की हालत तो बहुत ख़राब है.’ फिर उन्होंने कहा कि वह मुझे मदद में कुंआ देंगे. मैंने कहा मुझे धड़क योजना में कुंआ दे दो. उन्होंने कहा- धड़क नहीं, रोज़गार योजना में देंगे. फिर रोज़गार योजना में मुझे कुंआ जारी हुआ. मैंने अपनी तरफ़ से भी कर्ज़ा ले लेकर पैसे लगाए लेकिन कुएँ में आज तक पानी नहीं है”.
‘धड़क योजना’ महाराष्ट्र सरकार की एक जन-कल्याण स्कीम है. इसके तहत किसानों को सरकारी ख़र्च पर कुंआ बनवाकर दिया जाता है. इस योजना के तहत गांव में कुंआ बनवाने के लिए ‘किसान आत्महत्या’ की घटनाओं वाले परिवारों को प्राथमिकता दी जाती है. मोहन के परिवार को ‘धड़क योजना’ की बजाय मनरेगा योजना के तहत कुंआ दिया गया. इसके तहत ज़मीन देने से लेकर मज़दूर जुटाने तक का सारा काम ग्राम पंचायत और क्षेत्र में मनरेगा के नोडल अधिकारी के पास आ गया. मोहन के अनुसार प्रशासनिक लचरता, कभी मज़दूरों की कमी तो कभी मशीनों की गैर-मौजूदगी की वजह से उनके कुंए का काम पूरा नहीं हो पाया. क़र्ज़ जस का तस बना रहा.
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