बरेली लोकसभा सीट पर एक बार फिर बीजेपी के संतोष कुमार गंगवार अपनी
किस्मत आजमा रहे हैं. उनका मुक़ाबला कांग्रेस के प्रवीण सिंह एरन और सपा के
गठबंधन प्रत्याशी भगवत शरण गंगवार से है.
मुज़फ़्फ़रनगर
2014 में बीजेपी के संजीव कुमार बालियान बसपा के कादिर राणा को चार लाख वोटों से हराकर निर्वाचित हुए थे. इस बार यहां से राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष अजित सिंह यहां से मैदान में है और बीजेपी ने एक बार फिर संजीव बालियान पर भरोसा जताया है. कांग्रेस ने अपना कोई प्रत्याशी नहीं उतारा है. मुज़फ़्फ़रनगर लोकसभा सीट 2013 के दंगों के कारण काफी चर्चा में रहा है. यहां लगभग 16.5 लाख मतदाता हैं. जिसमें मुसलमानों के वोट 5 लाख, जाटों के डेढ़ लाख और जाटवों के ढाई लाख वोट हैं.
केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह यहां से मौजूदा सांसद हैं और इस बार भी बीजेपी से उम्मीदवार हैं. उनके सामने सपा-बसपा गठबंधन ने फ़िल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी पूनम सिन्हा को टिकट दिया जो पहली बार चुनाव लड़ रही हैं.
बीबीसी के साथ ख़ास बातचीत में उन्होंने साफ़ तौर पर कहा कि उनका किसी से मुक़ाबला नहीं है और वो इस चुनाव को बड़ी आसानी से जीत रही हैं. कांग्रेस पार्टी ने आचार्य प्रमोद कृष्णन को उतारा है.
उन्नाव
उन्नाव लोकसभा सीट से बीजेपी के साक्षी महाराज वर्तमान सांसद हैं. 2017 में यहां की छह विधानसभा सीटों में से पांच पर बीजेपी का कब्जा रहा था जबकि एक सीट पर बसपा प्रत्याशी को जीत मिली थी. हालांकि 2004 में बसपा और 2009 में कांग्रेस यहां जीत दर्ज कर चुकी हैं.
2004 से इस सीट पर राहुल गांधी सांसद रहे हैं. इससे पहले भी यह सीट (दो बार छोड़ कर) कांग्रेस के ही खाते में रही है.
2014 में यहां से बीजेपी ने स्मृति ईरानी को उतार कर मुक़ाबला दिलचस्प बना दिया था और उन्हें तीन लाख वोट भी पड़े थे. इस बार भी स्मृति ईरानी मैदान में हैं और गठबंधन ने यहां से अपना प्रत्याशी नहीं उतारा है. यानी इन दोनों प्रत्याशियों के बीच सीधा मुक़ाबला है.
इस सीट से बीजेपी के रवि किशन और सपा-बसपा-रालोद उम्मीदवार रामभुआल निषाद मैदान में हैं जबकि कांग्रेस के मधुसूदन तिवारी मुक़ाबले को त्रिकोणीय बना रहे हैं.
2014 में इस सीट पर बीजेपी प्रत्याशी कृष्ण प्रताप सिंह महज 42 हज़ार वोटों से जीते लेकिन 2018 में हुए उपचुनाव में बीजेपी ने ये सीट गंवा दी थी और सपा-बसपा और निषाद पार्टी के संयुक्त प्रत्याशी प्रवीण निषाद विजयी हुए थे. हालांकि इस बार मामला कुछ पेंचीदा है क्योंकि निषाद पार्टी ने बीजेपी का दामन थाम लिया है.
गाज़ीपुर
2014 में इस सीट से बीजेपी के मनोज सिन्हा निर्वाचन हुए थे. उन्होंने समाजवादी पार्टी के शिवकन्या कुशवाहा को क़रीब 32 हज़ार वोटों से हराया था. इस बार मनोज सिन्हा फिर मैदान में हैं और उनके सामने गठबंधन ने अफजाल अंसारी को खड़ा किया है.
2014 में मुलायम सिंह यादव यहां से मैदान में थे तो इस बार उनके बेटे अखिलेश महागठबंधन के उम्मीदवार हैं.
कांग्रेस पार्टी ने यहाँ इस बार अपना प्रत्याशी खड़ा नहीं किया है और इलाक़े के जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने भी अपना कैंडिडेट एक स्थानीय और बेहद लोकप्रिय भोजपुरी गायक दिनेश लाल यादव 'निरहुआ' को मैदान में उतारा है. यह पूर्वी उत्तर प्रदेश की एकमात्र ऐसी लोकसभा सीट है जिसपर 2014 की 'मोदी लहर' का असर नहीं दिखा था.
रामपुर
रामपुर वो लोकसभा सीट है जिस पर चुनाव जीत कर अबुल कलाम आज़ाद देश के पहले शिक्षा मंत्री बने थे.
2014 में यहां से मोदी लहर का फायदा बीजेपी के नेपाल सिंह को मिला था हालांकि उससे पहले 2004 और 2009 में तब समाजवादी प्रत्याशी रहीं जयाप्रदा जीतकर संसद पहुंची थी जो इस बार बीजेपी के चुनाव चिह्न से मैदान में हैं.
हालांकि इसे आज़म ख़ान के प्रभाव वाली सीट माना जाता है. और इस बार आज़म और सपा छोड़कर बीजेपी में गईं जयाप्रदा के बीच सीधा मुक़ाबला है. दोनों के बीच जुबानी जंग भी हो चुका है. और उस दौरान आज़म ख़ान को चुनाव आयोग ने 72 घंटे प्रचार करने से रोक दिया था.
1996 से लेकर अब तक इस सीट पर समाजवाटी पार्टी का कब्जा रहा है. इस बार इस सीट से खुद मुलायम सिंह यादव चुनाव लड़ रहे हैं. 2014 में भी यहां से मुलायम सिंह यादव चुनाव जीते थे, लेकिन उन्होंने इस सीट को छोड़ दिया था.
इसके बाद उनके पोते तेजप्रताप सिंह यादव ने यहां हुए उपचुनाव में बड़े अंतर से जीत हासिल की थी. कांग्रेस ने इस सीट से अपना प्रत्याशी नहीं उतारने का फ़ैसला किया है. बीजेपी ने प्रेम सिंह शाक्य पर दांव लगाया है, जो उपचुनाव में भी बीजेपी प्रत्याशी थे.
2014 में इस सीट से बीजेपी प्रत्याशी वरुण गांधी बीजेपी की टिकट पर जीते थे. इस बार वरुण गांधी पीलीभीत सीट से मैदान में उतरे हैं जबकि उनकी मां केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी यहां से उम्मीदवार हैं. चुनाव प्रचार के दौरान मेनका गांधी मुसलमानों पर दिये अपने बयान को लेकर विवादों में रहीं.
महागठबंधन ने मधेपुरा से शरद यादव को अपना उम्मीदवार बनाया है. लेकिन मुक़ाबला दिलचस्प हो गया जब पप्पू यादव ने भी इसी सीट से लड़ने की घोषणा कर दी जो कभी खुद राष्ट्रीय जनता दल की सीट से लड़कर शरद यादव को 2014 चुनावों में हरा चुके हैं.
पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन कांग्रेस की सुपौल से उम्मीदवार हैं जो बिहार में महागठबंधन का हिस्सा है. इस बार जेडीयू ने दिनेश चंद्र यादव को यहां से टिकट दी है जो पहले भी कई बार सांसद रह चुके हैं और बिहार सरकार में मंत्री भी.
गांधी मैदान पटना साहिब की एक बड़ी पहचान है जहां कई बड़े नेताओं ने रैलियां की हैं. कभी सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, राम मनोहर लोहिया और अटल बिहारी वाजपेयी भी रैलियां कर चुके हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी यहां रैली की है. जयप्रकाश नारायण ने 1974 में इसी मैदान से संपूर्ण क्रांति की बात कही थी.
परिसीमन के बाद 2009 में पहली बार यहां लोकसभा चुनाव हुए जिसमें बीजेपी के टिकट पर शत्रुघ्न सिन्हा की जीत हुई. 2014 में वे फिर से यहीं से सांसद बने. इस बार बीजेपी ने उनका टिकट काटकर केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद को दे दिया. कायस्थ बहुल इस सीट पर शत्रुघ्न सिन्हा कांग्रेस के प्रत्याशी हैं.
राष्ट्रद्रोह के केस से सुर्खियों में आए जेएनयू के पूर्व छात्र नेता कन्हैया कुमार इस सीट से सीपीआई की टिकट पर चुनाव मैदान में हैं. 2014 में पहली बार इस सीट से बीजेपी के भोला सिंह को जीत मिली थी लेकिन अक्तूबर 2018 में उनकी मौत हो गई.
इस बार बीजेपी ने गिरिराज सिंह को यहां से टिकट दी है. महागठबंधन के सीट बंटवारे में ये सीट आरजेडी ने अपने पास रखी और एक बार फिर डॉ. तनवीर हसन को मैदान में उतारा है. बेगूसराय में मुस्लिम और ओबीसी से कहीं ज्यादा भूमिहार वोट मायने रखता है और अब तक यहां से सबसे ज़्यादा भूमिहार उम्मीदवार ही जीतते आये हैं. बीजेपी और सीपीआई के उम्मीदवार गिरिराज सिंह और कन्हैया कुमार दोनों ही भूमिहार हैं. आबादी के लिहाज से यहां मुसलमान दूसरे नंबर पर हैं लिहाजा महागठबंधन ने मुस्लिम प्रत्याशी को तरजीह दी है.
सिवान
सिवान लोकसभा सीट पर जेडीयू-बीजेपी गठबंधन ने कविता सिंह को उतारा है. बाहुबली अजय सिंह की पत्नी कविता सिंह दरौंदा सीट (सिवान लोकसभा की छह विधानसभा सीटों में से एक) से विधायक हैं. इस सीट पर राजद नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन का दबदबा रहा है जो कि फिलहाल कत्ल के आरोप में जेल में बंद हैं. 1996 से लगातार चार बार शहाबुद्दीन यहां सांसद रहे हैं. शहाबुद्दीन को तेज़ाब कांड में सज़ा होने के बाद 2009 और 2014 में बीजेपी के ओमप्रकाश यादव यहां से सांसद रहे. 2014 में आरजेडी की हीना शहाब दूसरे नंबर पर रही थीं. सिवान की छह विधानसभा सीटों में से 3 जेडीयू, 1 बीजेपी, 1 आरजेडी और एक सीपीआईएमएल के पास है.
मुज़फ़्फ़रनगर
2014 में बीजेपी के संजीव कुमार बालियान बसपा के कादिर राणा को चार लाख वोटों से हराकर निर्वाचित हुए थे. इस बार यहां से राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष अजित सिंह यहां से मैदान में है और बीजेपी ने एक बार फिर संजीव बालियान पर भरोसा जताया है. कांग्रेस ने अपना कोई प्रत्याशी नहीं उतारा है. मुज़फ़्फ़रनगर लोकसभा सीट 2013 के दंगों के कारण काफी चर्चा में रहा है. यहां लगभग 16.5 लाख मतदाता हैं. जिसमें मुसलमानों के वोट 5 लाख, जाटों के डेढ़ लाख और जाटवों के ढाई लाख वोट हैं.
केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह यहां से मौजूदा सांसद हैं और इस बार भी बीजेपी से उम्मीदवार हैं. उनके सामने सपा-बसपा गठबंधन ने फ़िल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी पूनम सिन्हा को टिकट दिया जो पहली बार चुनाव लड़ रही हैं.
बीबीसी के साथ ख़ास बातचीत में उन्होंने साफ़ तौर पर कहा कि उनका किसी से मुक़ाबला नहीं है और वो इस चुनाव को बड़ी आसानी से जीत रही हैं. कांग्रेस पार्टी ने आचार्य प्रमोद कृष्णन को उतारा है.
उन्नाव
उन्नाव लोकसभा सीट से बीजेपी के साक्षी महाराज वर्तमान सांसद हैं. 2017 में यहां की छह विधानसभा सीटों में से पांच पर बीजेपी का कब्जा रहा था जबकि एक सीट पर बसपा प्रत्याशी को जीत मिली थी. हालांकि 2004 में बसपा और 2009 में कांग्रेस यहां जीत दर्ज कर चुकी हैं.
2004 से इस सीट पर राहुल गांधी सांसद रहे हैं. इससे पहले भी यह सीट (दो बार छोड़ कर) कांग्रेस के ही खाते में रही है.
2014 में यहां से बीजेपी ने स्मृति ईरानी को उतार कर मुक़ाबला दिलचस्प बना दिया था और उन्हें तीन लाख वोट भी पड़े थे. इस बार भी स्मृति ईरानी मैदान में हैं और गठबंधन ने यहां से अपना प्रत्याशी नहीं उतारा है. यानी इन दोनों प्रत्याशियों के बीच सीधा मुक़ाबला है.
इस सीट से बीजेपी के रवि किशन और सपा-बसपा-रालोद उम्मीदवार रामभुआल निषाद मैदान में हैं जबकि कांग्रेस के मधुसूदन तिवारी मुक़ाबले को त्रिकोणीय बना रहे हैं.
2014 में इस सीट पर बीजेपी प्रत्याशी कृष्ण प्रताप सिंह महज 42 हज़ार वोटों से जीते लेकिन 2018 में हुए उपचुनाव में बीजेपी ने ये सीट गंवा दी थी और सपा-बसपा और निषाद पार्टी के संयुक्त प्रत्याशी प्रवीण निषाद विजयी हुए थे. हालांकि इस बार मामला कुछ पेंचीदा है क्योंकि निषाद पार्टी ने बीजेपी का दामन थाम लिया है.
गाज़ीपुर
2014 में इस सीट से बीजेपी के मनोज सिन्हा निर्वाचन हुए थे. उन्होंने समाजवादी पार्टी के शिवकन्या कुशवाहा को क़रीब 32 हज़ार वोटों से हराया था. इस बार मनोज सिन्हा फिर मैदान में हैं और उनके सामने गठबंधन ने अफजाल अंसारी को खड़ा किया है.
2014 में मुलायम सिंह यादव यहां से मैदान में थे तो इस बार उनके बेटे अखिलेश महागठबंधन के उम्मीदवार हैं.
कांग्रेस पार्टी ने यहाँ इस बार अपना प्रत्याशी खड़ा नहीं किया है और इलाक़े के जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने भी अपना कैंडिडेट एक स्थानीय और बेहद लोकप्रिय भोजपुरी गायक दिनेश लाल यादव 'निरहुआ' को मैदान में उतारा है. यह पूर्वी उत्तर प्रदेश की एकमात्र ऐसी लोकसभा सीट है जिसपर 2014 की 'मोदी लहर' का असर नहीं दिखा था.
रामपुर
रामपुर वो लोकसभा सीट है जिस पर चुनाव जीत कर अबुल कलाम आज़ाद देश के पहले शिक्षा मंत्री बने थे.
2014 में यहां से मोदी लहर का फायदा बीजेपी के नेपाल सिंह को मिला था हालांकि उससे पहले 2004 और 2009 में तब समाजवादी प्रत्याशी रहीं जयाप्रदा जीतकर संसद पहुंची थी जो इस बार बीजेपी के चुनाव चिह्न से मैदान में हैं.
हालांकि इसे आज़म ख़ान के प्रभाव वाली सीट माना जाता है. और इस बार आज़म और सपा छोड़कर बीजेपी में गईं जयाप्रदा के बीच सीधा मुक़ाबला है. दोनों के बीच जुबानी जंग भी हो चुका है. और उस दौरान आज़म ख़ान को चुनाव आयोग ने 72 घंटे प्रचार करने से रोक दिया था.
1996 से लेकर अब तक इस सीट पर समाजवाटी पार्टी का कब्जा रहा है. इस बार इस सीट से खुद मुलायम सिंह यादव चुनाव लड़ रहे हैं. 2014 में भी यहां से मुलायम सिंह यादव चुनाव जीते थे, लेकिन उन्होंने इस सीट को छोड़ दिया था.
इसके बाद उनके पोते तेजप्रताप सिंह यादव ने यहां हुए उपचुनाव में बड़े अंतर से जीत हासिल की थी. कांग्रेस ने इस सीट से अपना प्रत्याशी नहीं उतारने का फ़ैसला किया है. बीजेपी ने प्रेम सिंह शाक्य पर दांव लगाया है, जो उपचुनाव में भी बीजेपी प्रत्याशी थे.
2014 में इस सीट से बीजेपी प्रत्याशी वरुण गांधी बीजेपी की टिकट पर जीते थे. इस बार वरुण गांधी पीलीभीत सीट से मैदान में उतरे हैं जबकि उनकी मां केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी यहां से उम्मीदवार हैं. चुनाव प्रचार के दौरान मेनका गांधी मुसलमानों पर दिये अपने बयान को लेकर विवादों में रहीं.
महागठबंधन ने मधेपुरा से शरद यादव को अपना उम्मीदवार बनाया है. लेकिन मुक़ाबला दिलचस्प हो गया जब पप्पू यादव ने भी इसी सीट से लड़ने की घोषणा कर दी जो कभी खुद राष्ट्रीय जनता दल की सीट से लड़कर शरद यादव को 2014 चुनावों में हरा चुके हैं.
पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन कांग्रेस की सुपौल से उम्मीदवार हैं जो बिहार में महागठबंधन का हिस्सा है. इस बार जेडीयू ने दिनेश चंद्र यादव को यहां से टिकट दी है जो पहले भी कई बार सांसद रह चुके हैं और बिहार सरकार में मंत्री भी.
गांधी मैदान पटना साहिब की एक बड़ी पहचान है जहां कई बड़े नेताओं ने रैलियां की हैं. कभी सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, राम मनोहर लोहिया और अटल बिहारी वाजपेयी भी रैलियां कर चुके हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी यहां रैली की है. जयप्रकाश नारायण ने 1974 में इसी मैदान से संपूर्ण क्रांति की बात कही थी.
परिसीमन के बाद 2009 में पहली बार यहां लोकसभा चुनाव हुए जिसमें बीजेपी के टिकट पर शत्रुघ्न सिन्हा की जीत हुई. 2014 में वे फिर से यहीं से सांसद बने. इस बार बीजेपी ने उनका टिकट काटकर केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद को दे दिया. कायस्थ बहुल इस सीट पर शत्रुघ्न सिन्हा कांग्रेस के प्रत्याशी हैं.
राष्ट्रद्रोह के केस से सुर्खियों में आए जेएनयू के पूर्व छात्र नेता कन्हैया कुमार इस सीट से सीपीआई की टिकट पर चुनाव मैदान में हैं. 2014 में पहली बार इस सीट से बीजेपी के भोला सिंह को जीत मिली थी लेकिन अक्तूबर 2018 में उनकी मौत हो गई.
इस बार बीजेपी ने गिरिराज सिंह को यहां से टिकट दी है. महागठबंधन के सीट बंटवारे में ये सीट आरजेडी ने अपने पास रखी और एक बार फिर डॉ. तनवीर हसन को मैदान में उतारा है. बेगूसराय में मुस्लिम और ओबीसी से कहीं ज्यादा भूमिहार वोट मायने रखता है और अब तक यहां से सबसे ज़्यादा भूमिहार उम्मीदवार ही जीतते आये हैं. बीजेपी और सीपीआई के उम्मीदवार गिरिराज सिंह और कन्हैया कुमार दोनों ही भूमिहार हैं. आबादी के लिहाज से यहां मुसलमान दूसरे नंबर पर हैं लिहाजा महागठबंधन ने मुस्लिम प्रत्याशी को तरजीह दी है.
सिवान
सिवान लोकसभा सीट पर जेडीयू-बीजेपी गठबंधन ने कविता सिंह को उतारा है. बाहुबली अजय सिंह की पत्नी कविता सिंह दरौंदा सीट (सिवान लोकसभा की छह विधानसभा सीटों में से एक) से विधायक हैं. इस सीट पर राजद नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन का दबदबा रहा है जो कि फिलहाल कत्ल के आरोप में जेल में बंद हैं. 1996 से लगातार चार बार शहाबुद्दीन यहां सांसद रहे हैं. शहाबुद्दीन को तेज़ाब कांड में सज़ा होने के बाद 2009 और 2014 में बीजेपी के ओमप्रकाश यादव यहां से सांसद रहे. 2014 में आरजेडी की हीना शहाब दूसरे नंबर पर रही थीं. सिवान की छह विधानसभा सीटों में से 3 जेडीयू, 1 बीजेपी, 1 आरजेडी और एक सीपीआईएमएल के पास है.
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